संपादकीय....रोकिए मणिपुर हिंसा की आग को....


मणिपुर की हिंसा को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। वहां विगत तीन मई से शुरू हुई हिंसा बताती है कि यह इलाका कितना नाजुक है। पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से में अभी भी मार्शल लॉ लगा हुआ है। इसने तकरीबन सात दशकों तक हिंसा देखी है, जिसमें हजारों लोग मारे गए और गायब हो गए। अभी भी भी मणिपुर की पहाडिय़ां और घाटी सुलग रही हैं। उधर राजनीति कर्नाटक चुनाव पर केंद्रित होकर रह गई है।
असल में यह क्षेत्र पांच देशों चीन, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार के साथ सीमा साझा करता है। वर्तमान हिंसा का दौर मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग पर शुरू हुआ है। परंतु देखा जाए तो मणिपुर में हिंसा का विस्फोट दशकों की उपेक्षा, भेदभाव, आपराधिक-राजनीतिक गठजोड़ और हिंसक उग्रवाद का नतीजा है। इसने यहां रहने वालों के बीच बड़े पैमाने पर असुरक्षा को जन्म दिया है। इस नाजुक क्षेत्र में छोटे और हल्के हथियार आते हैं, नशे का अवैध व्यापार होता है और मानव तस्करी तक होती है। सही बात तो यह है कि ये मुद्दे हल नहीं हो पाए, जिसने कई जातीय समूहों को खुद को सशस्त्र करने के लिए प्रेरित किया। एक समय ऐसा था कि मणिपुर में 60 सशस्त्र समूह हुआ करते थे।
स्थानीय मुद्दों के साथ ही मणिपुर में शरणार्थी समस्या भी बहुत बड़ा मुद्दा है। म्यांमार के साथ पूर्वाेत्तर की 1,643 किलोमीटर की सीमा है। अनुमान है कि म्यांमार पार करके लगभग 52हजार लोग आए हैं। इनमें से अधिकतर म्यांमार के चिन और सागैंग जैसे राज्यों से हैं। इन अनुमानों में नई दिल्ली में मौजूद 4,900, मिजोरम के 39,600 और मणिपुर के 7,800 शरणार्थी या शरण चाहने वाले शामिल हैं। हो सकता है यह संख्या कम हो, मगर समस्या तो है ही। खासतौर से मणिपुर में, जहां सैकड़ों बर्मी शरणार्थियों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि भारत ने 1961 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन या इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर दस्तखत नहीं किए हैं, मगर अतीत में देश ने कई शरणार्थी समुदाय संभाले हैं।
बात करें तो यह साफ नहीं कहा जा सकता कि म्यांमार में 2021 हुए सैन्य तख्तापलट और मौजूदा बर्मी शरणार्थी संकट में क्या संबंध है, फिर भी इसने मणिपुर में कई सामुदायिक संगठनों को आंदोलन के लिए प्रेरित तो किया है। मणिपुर हाई कोर्ट ने पहले के एक मामले में तय किया था कि म्यांमार के शरणार्थियों को शरण का अधिकार है। बर्मी और बाकी शरणार्थियों को भारत में अस्थाई रिफ्यूजी वीजा के साथ एग्जिट परमिट चाहिए, ताकि वे दुनिया भर के बाकी देशों में शरण ले सकें। ऐसे में भारत को इस मामले में संयुक्त राष्ट्र के साथ बात करना चाहिए, ताकि हिंसक संघर्ष से भाग रहे सभी लोगों को शरणार्थी वीजा दिया जा सके। माना जा रहा है कि इससे मणिपुर और बाकी पूर्वोत्तर राज्यों में शांति स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
दूसरी बात यह है कि इस इलाके में शांति और स्थिरता के लिए म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी को जरूरी माना जा रहा है। वहां तख्तापलट के बाद से म्यांमार में अस्थिरता और आपराधिक गतिविधियां बढ़ी हैं। यह स्थिति पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती है। जबसे म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुआ है, यूएन के ड्रग्स एंड क्राइम ऑफिस के मुताबिक अफीम उत्पादन दोगुना हो गया है। साथ ही मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक दवाएं भी खूब बन रही हैं। सो ये भी झगड़े की बड़ी जड़ हैं।
माना जा रहा है कि यदि भारत म्यांमार में सैन्य शासकों को राजनीतिक वैधता देने के लिए कुछ भी करता है, तो वह केवल युद्ध को जारी रखने और पूर्वोत्तर भारत में भागने के लिए मजबूर शरणार्थियों की संख्या ही बढ़ाएगा। बंदूक की नोक पर न तो राष्ट्र बन सकता है और न ही लोकतंत्र आगे बढ़ सकता है। इतिहास 1904 और 1939 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए मणिपुर महिला विद्रोह का गवाह है। हालांकि मणिपुर की मीरा पैबिस, नगा मदर्स असोसिएशन, कूकी मदर्स असोसिएशन और नॉर्थ ईस्ट इंडिया विमिन इनीशटिव फॉर पीस का काम उम्मीद दिलाता है, परंतु सरकार को भी इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि शांति स्थापना के लिए पूर्वोत्तर के लोगों, खासतौर से महिलाओं और स्थानीय समुदायों के प्रयासों पर ध्यान देते हुए उन्हें आगे बढ़ाया जाता है तो इसके सार्थक परिणाम आ सकते हैं। केंद्र सरकार को सभी से वार्ताओं का दौर तेज करना होगा, ऐसा न हो मणिपुर में फैली हिंसा की आग फिर दूसरे राज्यों को अपने चपेट में न ले ले।
- संजय सक्सेना
--------

0/Post a Comment/Comments